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2020-04-02 11:56:22
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अनिलः आमतौर पर किसी भी देश में खुफिया ठिकानों या फिर संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा का जिम्मा सेना के हाथ में होता है, लेकिन दुनिया में एक जगह ऐसी भी है, जहां परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा भंडार है और उसकी सुरक्षा करती हैं डॉल्फिन मछलियां। यह हैरान करने वाली बात तो है, लेकिन बिल्कुल सच है। असल में इसके पीछे एक बड़ी वजह है, जिसके बारे में शायद ही कोई आम आदमी सोच पाए।

यह जगह अमेरिका के सिएटेल शहर से करीब 20 मील की दूरी पर है। दरअसल, यहां अमेरिकी नेवी का बेस कैंप है, जिसे 'नेवल बेस किटसैप' कहते हैं। यह जगह दुनियाभर में इसलिए मशहूर है, क्योंकि अमेरिका के करीब एक चौथाई परमाणु हथियार यहीं पर रखे हुए हैं। यहां इतनी मात्रा में परमाणु हथियार हैं कि एक झटके में कई देशों का सफाया हो जाए। इसी वजह से इस जगह को दुनिया में परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा भंडार कहते हैं।

अमेरिका ने अपने इस परमाणु भंडार की रक्षा के लिए इंसान या मशीन नहीं बल्कि डॉल्फिन और सी लॉयन (समुद्री शेर) की एक बड़ी फौज रखी है। इस अनोखी फौज में करीब 85 डॉल्फिन और 50 समुद्री शेर हैं। इन्हें खासतौर पर परमाणु हथियारों की रक्षा के लिए कैलिफोर्निया स्थित एक प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षित किया गया है


नीलमः मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डॉल्फिन और समुद्री शेरों के शरीर में एक बाइट प्लेट फिट कर दी जाती है। अगर कोई घुसपैठिया समुद्री रास्ते से परमाणु हथियारों के पास जाने की कोशिश करता है तो ये समुद्री जीव उसके पैर से जाकर टकराते हैं, जिससे प्लेट उनकी टांग में चिपक जाती है और वो तब तक उसे बाहर नहीं निकाल सकता है, जब तक कि उससे संदेश समुद्री जीवों के हैंडलर तक नहीं पहुंच जाता। इससे घुसपैठिये पर नजर रखी जाती है और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई भी की जाती है।

दरअसल, डॉल्फिन और समुद्री शेरों को यह काम इसलिए सौंपा गया है, क्योंकि डॉल्फिन के अंदर खूबी होती है कि वो समुद्र के काफी नीचे की चीजों का भी पता लगा सकती है। इसके अलावा समुद्री शेरों की सुनने और देखने की क्षमता बहुत अधिक होती है। वह समुद्र की गहराई में, जहां सिर्फ अंधेरा ही होता है, वहां भी ये देख सकते हैं। यही वजह है कि इन्हीं दो समुद्री जीवों को परमाणु हथियारों की सुरक्षा का काम सौंपा गया है।


अनिलः वहीं आपको जानकर हैरानी होगी कि बिहार में एक ऐसा गांव है, जहां लोग चमगादड़ों की पूजा करते हैं। उनका मानना है कि ये चमगादड़ उन्हें महामारी से बचाते हैं।

इस गांव का नाम है सरसई (रामपुर रत्नाकर), जो वैशाली जिले के राजापाकड़ प्रखंड में पड़ता है। यहां के लोग चमगादड़ों को 'ग्राम देवता' के रूप में मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। वह इन्हें संपन्नता का प्रतीक मानते हैं। उनका मानना है कि जिस इलाके में चमगादड़ निवास करते हैं, वहां धन की कोई कमी नहीं होती।

सरसई गांव के लोगों का यह भी मानना है कि यहां निवास करने वाले चमगादड़ उनके पूरे गांव की रक्षा करते हैं और साथ ही उनके ऊपर किसी तरह की विपत्ति नहीं आने देते। यहां तक कि ये उन्हें किसी भी तरह की महामारी से भी बचाते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि गांव में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले लोग चमगादड़ों की पूजा करते हैं, ताकि सब सही-सही हो।

इस गांव में सैकड़ों की संख्या में ये चमगादड़ एक तालाब के किनारे पीपल के पेड़ पर और आसपास के अन्य पेड़ों पर निवास करते हैं। इन चमगादड़ों की वजह से ही यह गांव पूरे इलाके में मशहूर है और लोग दूर-दूर से इन्हें देखने के लिए आते हैं। गांव वालों का कहना है कि अगर रात में कोई बाहरी व्यक्ति इस गांव में आता है तो ये चमगादड़ शोर मचाने लगते हैं जबकि गांव वालों के आने पर ये शांत रहते हैं।


नीलमः अब एक और जानकारी। आमतौर पर ऐसा कहा जाता है कि इंसान कभी भी किसी इलाके में अकेला नहीं रह सकता, क्योंकि यह उसकी प्रवृति नहीं होती। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में ऐसे भी कई लोग हैं जो एक पूरे के पूरे शहर में अकेले रहते हैं। हम आपको ऐसे व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे हैं, जो दुनिया की सबसे खतरनाक जगह पर अकेला रहता है। वह इलाका पिछले नौ साल से वीरान है।

इस शख्स का नाम है नाओतो मात्सुमुरा और ये रहते हैं जापान के एक छोटे से शहर तोमियोको में। दरअसल, 11 मार्च 2011 को जापान के फुकुशिमा में एक भयानक परमाणु दुर्घटना हुई थी, जिसके बाद तोमियोको सहित आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग अपना घर-बाड़ छोड़कर दूसरे इलाकों में चले गए। नाओतो मात्सुमुरा भी तोमियोको से चले गए थे, लेकिन उन्हें रहने की कोई जगह नहीं मिली तो वो फिर वापस तोमियोको आ गए। इसके अलावा एक और वजह है जो उन्हें यहां फिर से वापस लेकर आ गई।

दरअसल, मात्सुमुरा को जानवरों से बहुत लगाव है। परमाणु दुर्घटना के बाद वो तोमियोको से चले तो गए थे, लेकिन यहां के जानवर उस इलाके को छोड़कर कहीं नहीं जा रहे थे, इसलिए मजबूरन उन्हें भी तोमियोको आना पड़ा। अब चूंकि उस इलाके में रेडिएशन का भयंकर खतरा था, क्योंकि वहां की मिट्टी और पानी में रेडिएशन मिला हुआ था। इसलिए उन्होंने यहां रहने से पहले जानकारी इकट्ठा की। जापान की एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी की ओर से उन्हें बताया गया कि वह कम से कम 30-40 साल तक को बीमार नहीं पड़ेंगे। इसके बाद से वो यहां मजे से रहने लगे।


अनिलः मात्सुमुरा को फुकुशिमा के जानवरों का संरक्षक कहा जाता है। शुरुआत में तो वह सिर्फ अपने पालतू जानवरों का ही ख्याल रखते थे, लेकिन बाद में वह लावारिस जानवरों के संरक्षक बन गए। मात्सुमुरा को 'रेडियोएक्टिव मैन' भी कहा जाता है, क्योंकि एक शोध के मुताबिक, एक आम आदमी पर पूरी जिंदगी में जितना रेडिएशन पड़ता है, उससे 17 गुना ज्यादा मात्सुमुरा पर पड़ा है। इसकी वजह ये है कि जब वो तोमियोको लौटे थे, तो यहां मौजूद सब्जियां, मांस या मछली खाते थे, जिसमें काफी ज्यादा रेडिएशन था। हालांकि अब वो बाहर का खाना खाते हैं और झरने का पानी पीते हैं। इन दोनों ही चीजों में रेडिएशन नहीं है।

मात्सुमुरा जिस इलाके में रहते हैं, वहां न तो बिजली है और न ही पानी। हालांकि उनके पास एक सोलर पैनल है, जिसकी मदद से वो अपना मोबाइल चार्ज कर लेते हैं। साथ ही साथ उससे कंप्यूटर भी चला लेते हैं। उन्हें सिगरेट पीने की एक बुरी लत है। अब चूंकि उनके इलाके में तो कोई रहता नहीं, इसलिए वो कहीं दूर जाते हैं और सिगरेट खरीद कर लाते हैं। उनका कहना है कि अगर वो सिगरेट नहीं पीएंगे तो बीमार ही पड़ जाएंगे।


नीलमः अब समय हो गया है श्रोताओं की टिप्पणी का। पहला खत आया है, खंडवा मध्य प्रदेश से दुर्गेश नागनपुरे ने। लिखते हैं, नी हाउ नमस्कार, आदाब और वेरी गुड इवनिंग। लिखते हैं कि टी टाइम प्रोग्राम बहुत अच्छा लगता है। हम सांईराम रेडियो क्लब के सभी मित्रों ने एक साथ मिलकर मनोरंजन और विभिन्न प्रकार की रोचक, ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद जानकारियों से भरपूर आपके टी-टाइम प्रोग्राम का भरपूर आनंद लिया। कार्यक्रम में आपके द्वारा हैंड सैनिटाइजर बनाने वाली महिला ल्यूप हर्नान्डिज जी के बारे में दी गई जानकारी, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और विदिशा के बीच स्थित पीपल का वृक्ष अर्थात बोधि वृक्ष के बारे में दी गई जानकारी साथ ही आपने कार्यक्रम मे कुछ ऐसे देशों के बारे में जानकारी दी, जहां पर अभी भी एयरपोर्ट उपलब्ध नही है। इन तमाम जानकारियों को विस्तृत रूप से हम सभी श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु भाई अनिल जी का हम ह्रदयतल से आभार व्यक्त करते हैं और सभी श्रोताओं से यही कहना चाहते हैं कि आप अपने घर में ही रहें और अपनी सेहत का ध्यान रखें और कोरोना वायरस कोविड - 19 संक्रमण से बचने हेतु दिन में जितनी बार भी हो सके अपने हाथों को उच्च क्वालिटी के साबुन और सैनिटाइजर से समय समय पर धोते रहें। धन्यवाद। आज भी हम जोक्स भेज रहे हैं।


अनिलः अगला पत्र भेजा है, दरभंगा बिहार से शंकर प्रसाद शंभू ने। लिखते हैं, "खेल जगत" में बताया गया कि ब्राजील के शीर्ष फुटबॉल क्लबों ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में मदद हेतु स्वास्थ्य विभाग को स्टेडियम दिया है, जिससे सरकार को नये अस्पताल बहाल करने में आसानी हो सके। वहीं भारत के जाने माने पहलवान बजरंग पूनिया ने भी कोरोना वायरस महामारी से निपटने हेतु सरकार को मदद दी। कार्यक्रम से हमें यह भी ज्ञात हुआ कि टोक्यो ओलंपिक 2020 अब अगले वर्ष 2021 में होने वाला है। धन्यवाद शानदार प्रस्तुति के लिए।

नीलमः आगे लिखते हैं कि अभी भारत में लॉकडाउन के कारण हमने अपने क्लब के सदस्यों को आवश्यक दूरी पर बैठाने के बाद एक साथ साप्ताहिक कार्यक्रम "टी टाईम" ध्यानपूर्वक सुना, जिसमें आपने बताया कि1966 में अमेरिकी राज्य कैलिफोर्निया के बेकर्सफील्ड शहर में रहने वाली एक महिला 'ल्यूप हर्नान्डिज' ने सबसे पहले हैंड सैनिटाइजर बनाया था।

दूसरी जानकारी में बताया गया कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और विदिशा के बीच सलामतपुर की पहाड़ी पर स्थित बोधि वृक्ष के नाम से प्रसिद्ध एक पीपल के पेड़ की सुरक्षा में पुलिस के चार या पांच जवान तैनात हैं और वीआईपी नेता की तरह सुरक्षा दी जाती है। अगली जानकारी में सुना कि विश्व में अभी भी कुछ ऐसे देश हैं जहां अभी तक एक भी हवाईअड्डा नहीं है। जैसे यूरोप का छठा सबसे छोटा और दुनिया का 16वां सबसे छोटा देश 'अंडोरा', ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड के बीच में स्थित यूरोपीय देश 'लिस्टेंस्टीन', फ्रांस और इटली के बीच स्थित विश्व का दूसरा सबसे छोटा देश 'मोनाको' और यूरोप का सबसे पुराना गणराज्य माने जाने वाला छोटा देश 'सैन मैरिनो' में अभी तक कोई एयरपोर्ट यानि हवाईअड्डा उपलब्ध नहीं है। आधुनिक युग में यह उस देश के लिये दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। ये सभी जानकारियां बहुत अच्छी लगी।

धन्यवाद एक अच्छी प्रस्तुति के लिए।


अनिलः इसके साथ ही शंभू जी ने कोरोना के बारे में एक कविता भेजी है।

# *कोरोना से लड़ाई* #


कोरोना की लड़ाई में

मिलकर सामना करिये,

ये युद्ध थोड़ा अलग है

दूरी बनाकर ही लड़िये !

शत्रु बहुत ही सूक्ष्म है

इसे छूकर मत परखिये,

हराने का अचूक अस्त्र ये

बढिया साफ़-सफाई रखिये !

संकट बहुत ही भारी है

फिर भी गुजर ही जायेगा,

संयम और धैर्य से ही सब

इस दुश्मन को हरा पायेगा !

यदि आप स्वयं बचेंगे तो

दूसरे भी स्वयं बच जायेंगे,

इस लड़ाई में जीत होने से ही

परिवार में भी खुशियाँ लायेंगे !

शंभू जी शुक्रिया।


नीलमः वहीं अगला पत्र भेजा है, पंतनगर, उत्तराखंड से। वीरेंद्र मेहता ने। लिखते हैं, नमस्कार (नी हाउ )

टी टाइम प्रोग्राम का नया अंक सुना - जिसमें आपने सैनिटाइजर को सबसे पहले बनाने वाली ल्यूप हर्नान्डिज के बारे में संक्षिप्त में बताया । जिसका प्रयोग हम पिछले 54 सालों से कर रहे हैं ,जानकर आश्चर्य हुआ । ल्यूप हर्नान्डिज जो कि कैलिफ़ोर्निया की बेकर्सफील्ड शहर से ताल्लुक रखती है । सचमुच सैनिटाइजर का प्रयोग इस वैश्विक महामारी में खूब लाभदायक साबित हो रहा है । उनके इस नेक आविष्कार के लिए उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद । वहीं मध्यप्रदेश में पीपल के पेड़ की 24 घंटे सुरक्षा की जाती है जानकर बहुत आश्चर्य हुआ। वही फिर आपने इसके पीछे छिपे इतिहास के बारे में विस्तार में बताया गया। जानकारी बहुत अच्छी लगी । आज के इस समय में कुछ ऐसे भी भी देश है जिनके पास हवाई अड्डे नहीं है जानकर आश्चर्य हुआ । जिसमें एंडोरा , मोनाको , सैन मैरिनो आदि देश शामिल है । सुंदर प्रोग्राम की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद !


अनिलः अब पेश है केसिंगा उड़ीसा से सुरेश अग्रवाल का पत्र। लिखते हैं कि "खेल जगत" के तहत अनिल पाण्डेय द्वारा दी गयी यह जानकारी काफी महत्वपूर्ण लगी कि कोरोना महामारी से मुक़ाबले हेतु ब्राज़ील के तमाम शीर्ष फुटबॉल क्लबों द्वारा अपने स्टेडियम स्वास्थ्य विभाग को दे दिये गये हैं। भारतीय खिलाड़ी बजरंग पूनिया द्वारा भी अपने छह महीने का वेतन हरियाणा कोरोना रिलीफ़ फण्ड में दान कर दिया गया है। आपने जुलाई 2020 में होने वाले तोक्यो ओलम्पिक्स के रद्द होने की आशंका भी जतायी, जो कि रद्द हो चुका है। लगता है कि कार्यक्रम घोषणा से कुछ पहले रिकॉर्ड कर लिया गया था। तुर्की से लौटने के बाद एथलीट नीरज चोपड़ा के एकान्तवास में होने की बात भी समझ में आयी। धन्यवाद एक बेहतरीन प्रस्तुति के लिये।


नीलमः आगे लिखते हैं कि "टी टाइम" का आगाज कोरोना महामारी की ख़बर के साथ हैण्ड सैनिटाइजर की ईज़ाद की कहानी से किया जाना ज्ञानवर्ध्दक लगा। ज्ञात हुआ कि सैनिटाइजर का ख़्याल सबसे पहले सन 1966 में अमेरिकी राज्य कैलिफोर्निया स्थित बेकर्सफील्ड शहर की वा ल्यूप हर्नान्डिज नामक महिला को आया था। देखा जाये तो यह दुनिया को उनकी बहुत बड़ी देन है।


अनिलः वहीं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और विदिशा के बीच सलामतपुर की पहाड़ी पर स्थित एक पेड़ को किसी अति विशिष्ट नेता की तरह सुरक्षा प्रदान किये का समाचार भी मन में कौतूहल पैदा कर गया। ज्ञात हुआ कि साल में रखरखाव पर 12-15 लाख रुपये खर्च होने वाले उक्त बोधि-वृक्ष नामक पीपल के पेड़ को वर्ष 2012 में अपनी भारत-यात्रा के दौरान श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे द्वारा लगाया था।

नीलमः जानकारियों के क्रम में दुनिया के ख़ूबसूरत देशों के क्रम में यूरोप के छठे सबसे छोटे देश अंडोरा पर दी गयी जानकारी अत्यंत मनभावन लगी। ज्ञात हुआ कि महज़ 468 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस देश की जनसंख्या 85,000 है और यहां एक भी एयरपोर्ट नहीं हैं। इसके बावजूद यहां हर साल लाखों सैलानी घूमने आते हैं।

इसी प्रकार ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड के बीच में स्थित महज 160 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले देश लिस्टेंस्टीन में भी एयरपोर्ट का न होना अचम्भित करता है।

यूरोप के सबसे पुराने गणराज्य सैन मैरिन में भी आधुनिकता के इस दौर में अब तक कोई एयरपोर्ट न होने की बात कुछ चिन्तन, मनन करने को विवश करती है।

इन तमाम बातों के अलावा कार्यक्रम में पेश श्रोता-मित्रों की बेशक़ीमती राय एवं चुटीले जोक्स उसे चार-चाँद लगा गये। धन्यवाद एक सरस एवं सन्तुलित प्रस्तुति हेतु।


अनिलः अगला पत्र भेजा है पश्चिम बंगाल से न्यू हराइजन रेडियो लिस्नर्स क्लब के रविशंकर बसु ने। लिखते हैं, नमस्कार। सुना है कि पंकज श्रीवास्तव जी सीआरआई हिंदी सेवा में 8 साल काम करने के बाद भारत लौट रहे हैं। पिछले 8 वर्षों में सी.आर.आई. के एक कार्यक्रम - प्रस्तुतकर्ता के रूप में उन्होंने बेहतरीन ढंग से काम किया है। जिस अनूठे तरीके से पंकज जी हिंदी कार्यक्रम पेश करते रहे हैं, वह अत्यधिक सराहनीय है। सीआरआई के लिए उनके शानदार प्रयास, विशेष रूप से "दक्षिण एशिया फोकस", "आपकी पसंद ","न्यूज़ फोकस ","स्वर्णिम चीन के रंग"(कभी कभी आप का पत्र मिला जो अब बंद हो गया है) कार्यक्रम में सालों से हम लोग सराहना करते आये हैं। उनकी मधुर-आवाज़ और कार्यक्रम प्रस्तुत करने का दिलकश अंदाज़ सभी श्रोताओं के दिल को छूता रहा है। हिंदी सेवा के माध्यम से उनकी आवाज को हम भले ही न सुन पाएं, फिर भी हम उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। अंत में मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि "चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा नहीं कहना कभी अलविदा नहीं कहना" पंकज जी ! किसी ना किसी मोड़ पे हम फिर मिलेंगे। हमारे क्लब की ओर से आपको शुभकामनाएं। धन्यवाद।

अब समय हो गया है जोक्स यानी हंसगुल्लों का।

आज के जोक्स भी दुर्गेश नागनपुरे द्वारा भेजे गए हैं।


पहला जोक

मरते समय पति ने अपने पत्नी को सब कुछ सच बताना चाहा। उसने कहा मैं तुम्हें जीवन भर धोखा देता रहा। सच तो यह है कि दर्जनों औरतों से मेरे नाजायज संबंध थे।

पत्नी बोली, मै भी सच बताना चाहूंगी। तुम बीमारी से नही मर रहे, मैंने तुम्हें धीरे-धीरे असर करने वाला जहर दिया है।

दूसरा जोक

पत्नी :-मैंने आज सपनों मे देखा है कि तुम मेरे लिए हीरों का हार लाए हो, इस सपने का क्या मतलब है?

पति- आज शाम को बताऊंगा। शाम को पति ने एक पैकेट पत्नी को लाकर दिया। पत्नी ने खुशी-खुशी पैकेट खोला तो उस मे एक किताब निकली। किताब का नाम था,सपनों का मतलब।

तीसरा जोक

पति V विद्वानों ने कहा है कि मूर्खो की बीवी बहुत सुंदर होती है।

पत्नी V आपके पास तो हमारी तारीफ करने के सिवा कोई काम ही नही है।

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