छींगहाई-तिब्बत पठार में घास बोने से मरुस्थलीकरण क्षेत्रों में सुधार

2019-09-16 13:44:32
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पश्चिमी चीन स्थित छींगहाई-तिब्बत पठार पूरी एशिया में महत्वपूर्ण जल स्रोत माना जाता है। जहां चीन और एशिया की महत्वपूर्ण नदी जैसी यांगत्सी नदी, पीली नदी और यालूजांगबू नदी के जन्म क्षेत्र फैलते हैं। लेकिन इस क्षेत्र की पारिस्थितिक स्थितियां नाजुक हैं। कुछ क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण होने का रुझान नजर आया था। इस की रोकथाम करने के लिए चीनी पर्यावरण संरक्षण फाउंडेशन सहित संगठनों ने छींगहाई-तिब्बत पठार पर घास बोने से मरुस्थलीकरण क्षेत्रों में सुधार लाने की कोशिश की है।

तिब्बत स्तवायत्त प्रदेश के शिगात्से शहर की नामलीन काउंटी की ऊँचाई चार हजार मीटर होती है। जहां चीनी पर्यावरण संरक्षण फाउंडेशन ने वर्ष 2016 से मरुस्थलीकरण क्षेत्रों में सुधार लाने की कोशिश शुरू की। इधर के सालों में कुल 16.6 लाख वर्ग मीटर विशाल क्षेत्र में घास और जड़ी-बूटियां बोयी गयी हैं।

कृत्रिम रोपण के माध्यम से मरुस्थलीकरण भूमि का पारिस्थितिक वातावरण बहाल हो गया है। इस काउंटी के उप प्रमुख चांग पो ने कहा कि कृत्रिम तौर पर घास बोने से वनस्पति की कवरेज बढ़ गयी है, हवा और रेत के दिन कम हो गये हैं और लोगों की आर्थिक आय भी बढ़ायी गयी है।

उधर छींगहाई प्रांत के सानच्यांगयुवान क्षेत्र के मातो क्षेत्र में भी मरुस्थलीकरण की समस्या मौजूद है। पर यहां की समस्या है कि कृंतकों के कारण से घास का मैदान धीरे-धीरे निर्जन होता रहा। मातो कस्बे के प्रमुख च्यांगछ्वो ने बताया कि प्रति वर्ग मीटर के घास मैदान में तीन चार माउस छेद फैलते हैं। चूहे घास की जड़ों को भी खाते हैं और भूमि का मरुस्थलीकरण उत्पन्न हुआ है। इसी कारण से मातो कस्बे में 50 से 60 प्रतिशत के क्षेत्र निर्जन हो गये हैं। कृंतकों की रोकथाम के लिए लोगों ने यहां बड़े पैमाने पर जड़ी-बूटियों का रोपण लगाया। जड़ी बूटियों की जड़ें और तने कड़वे होते हैं, जो चूहे के लिए खाना पसंद नहीं है। इसी तरह चूहे के विरूद्ध में कोशिश की जा रही है। कर्मचारियों ने कहा कि यह काम करने से सानच्यांगयुवान क्षेत्र का संरक्षण करने के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाली जड़ी बूटियों की फसलें भी उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों ने अपने शोध से यह निष्कर्ष निकाला है कि घास या जड़ी बूटियों के रोपण को पारिस्थितिक प्रभाव के साथ जोड़ना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि 13वीं पंचवर्षीय योजना में छींगहाई प्रांत में तीन लाख हेक्टर मरुस्थलीय क्षेत्र का सुधार किया गया है। सानच्यांगयुवान क्षेत्र में मरुस्थलीकरण की स्थितियों को रोका गया है।

लोगों को साफ लगा है कि मरुस्थलीकरण को नियंत्रित करने के साथ-साथ पारिस्थितिक वातावरण में सुधार करना चाहिये। पारिस्थितिक सुधार और आर्थिक विकास दोनों को जोड़ देना ही चाहिये। उर्वरक और कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करने से पारिस्थितिक और आर्थिक लाभ मिल पाएगा। पठार की पारिस्थितिक समस्या को हल करने के लिए केवल स्थानीय सरकार और चरवाहों की शक्तियों पर भरोसा करना मुश्किल है। इसमें और अधिक सामाजिक पूंजी और शक्तियों के शामिल होने की बड़ी आवश्यकता है। चीनी पर्यावरण संरक्षण फाउंडेशन के महासचिव शू क्वांग ने कहा कि पारिस्थिक सुधार करने के लिए पूरे समाज यानी कि कारोबार, सरकार, सामाजिक संगठन और आम लोगों की शामिली होनी चाहिये। और पारिस्थिक निर्माण के कार्यों को गरीबी उन्मूलन के साथ भी जोड़ देना ही चाहिये।

ल्हासा शहर के आसपास क्षेत्र में मरुस्थलीकरण भूमि का सुधार

हाल ही में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के एक वरिष्ठ जांच दल ने ल्हासा शहर के आसपास क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण की स्थितियों की जांच की और वातावरण में सुधार लाने वाले कार्यों का निरीक्षण किया।

जांच दल ने ल्हासा शहर के आसपास क्षेत्रों में भूमि मरुस्थलीकरण से पर्यावरण और कृषि उत्पादन पर उत्पन्न नुकसान और प्रभाव की निगरानी की, और यह प्रस्तुत किया कि शहरी और ग्रामीण पर्यावरण और पारिस्थितिक गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए मरुस्थलीकरण का नियंत्रण करने की बड़ी आवश्यकता है। संबंधित विभागों को केंद्र और स्वायत्त प्रदेश की सरकारों की नीतियों के मुताबिक मरुस्थलीकरण रोकथाम के लिए एकीकृत योजना बनाकर हरियाली और मिट्टी संरक्षण जैसे मुद्दों का समन्वय करना चाहिये, ताकि तिब्बत के उच्च गुणवत्ता वाले विकास को बढ़ावा दिया जाए। स्वायत्त प्रदेश के वानिकी विभाग से प्राप्त खबर के अनुसार इधर के वर्षों में तिब्बत में चालीस हजार हेक्टर मरुस्थलीय क्षेत्रों का सुधार किया गया है। नवीनतम जांच के मुताबिक तिब्बत में रेतीली भूमि का क्षेत्रफल 13 हजार 600 हेक्टर कम हो गया है और मरुस्थलीय क्षेत्रों में 35,000 हेक्टर की कमी हो गयी है। भविष्य में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश वैज्ञानिक योजना के मुताबिक रेतीली क्षेत्रों और मरुस्थलीकरण भूमि के संरक्षण में सुधार करेगा, ताकि मरुस्थलीकरण क्षेत्र का पारिस्थितिक सुधार संपन्न हो सके।

वातावरण में सुधार लाने के लिए अथक प्रयास

आंकड़े बताते हैं कि लगातार कोशिश करने के जरिये तिब्बत में ल्हासा आदि शहरों के जलवायु में काफी सुधार आया है। ल्हासा शहर में पूरे साल के अधिकांश दिनों में वातावरण और जलवायु की जांच करने का परीणाम अच्छा रहा है। वायु की उत्कृष्ट दर 98.4% तक रही है, जो देश के सभी शहरों में सबसे अच्छा है। ल्हासा शहर के पर्यावरण संरक्षण ब्यूरो के प्रमुख ने बताया कि ल्हासा शहर में लोग वायु गुणवत्ता के मुद्दों पर सबसे ज्यादा चिंतित हैं। सुंदर वातावरण का लक्ष्य साकार करने के लिए तिब्बत स्वायत्त प्रदेश ने वायु प्रदूषण की रोकथाम और नीले आकाश का संरक्षण करने के लिए अथक प्रयास किया। वर्ष 2018 के अंत तक ल्हासा शहर में मोटर गाड़ियों की संख्या 2.5 लाख तक जा पहुंची है। जिससे वायु का प्रदूषण संपन्न होने लगा। मोटर वाहन प्रदूषण की रोकथाम के लिए स्वायत्त प्रदेश की सरकार ने कार प्रतिबंधों का सख्त कार्यान्वयन किया और पुरानी कारों को हटा दिया ।

वर्ष 2018 से तिब्बत ने "सार्वजनिक परिवहन प्राथमिकता" रणनीति के मुताबिक सार्वजनिक परिवहन का जोरदार विकास करना शुरू किया। अभी तक तिब्बत के कई हजार टैक्सी कारों में नई ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा टैक्सियों का अनुपात शत प्रतिशत तक रहा है। सार्वजनिक परिवहन की सभी गाड़ियों में 59.8% नई ऊर्जा की बसें हैं। साथ ही तिब्बत ने स्वच्छ हीटिंग और गैर-कोयला हीटिंग के विकास को बढ़ावा दिया और 80 प्रतिशत छोटे व पुराने कोयले बॉयलरों को बदला किया। ल्हासा आदि शहरों में वातावरण प्रदूषण की रोकथाम में सख्त मापदंड कायम किया गया है। सड़कों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए शहर के सभी निर्माण स्थलों के प्रवेश द्वार पर वाहन धोने की सुविधा भी स्थापित है, जहां कर्मचारी आने जाने वाली गाड़ियों की सफाई करते हैं। निर्माण स्थल में उत्पन्न कीचड़ आदि को हर दिन हटाया जाना पड़ता है, और अस्थायी रूप से संग्रहित निर्माण अपशिष्ट को भी कपड़े से कवर किया जाना पड़ता है। गत वर्ष से सरकार ने यह नियम बनाया कि सभी निर्माण स्थल पर प्रदूषण की निगरानी की जानी पड़ती है। ल्हासा शहर में निर्माण कचरा का परिवहन करने वाले वाहन को लाइसेंस की प्राप्ति होनी पड़ती है। पूरे शहर के कुल छह सौ ऐसे वाहनों को बंद परिवहन को सुनिश्चित करना पड़ता है। पुलिस और यातायात विभागों ने सहयोग कर ल्हासा शहर में निर्माण कचरे की डंपिंग के खिलाफ कदम उठाये हैं।

उधर,रेस्त्रां सहित खानपान उद्योग का तेल धूम्रपान ल्हासा शहर में प्रदूषण का स्रोत भी है। ल्हासा शहर के पर्यावरण संरक्षण ब्यूरो के तहत पर्यावरण निगरानी टुकड़ी के प्रधान सांगाराम ने कहा कि हम ने खानपान उद्योग के संचालकों में वातावरण संरक्षण का प्रचार प्रसार किया और उन की पर्यावरण जागरूकता को बढ़ा दिया। सभी खानपान इकाइयों को निर्धारित समय में तेल व धूम्रपान के शुद्धिकरण के मानक को पूरा करना चाहिये। अभी तक शहर में 80 प्रतिशत रेस्त्रां में तेल व धूम्रपान के शुद्धिकरण की सुविधाएं स्थापित की गयी हैं। निरंतर कदम उठाने से तिब्बत के पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाया गया और वायु प्रदूषण की रोकथाम में स्पष्ट प्रगतियां हासिल की गयी हैं। और तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में वायु की गुणवत्ता पूरे देश में सबसे अच्छी साबित है।

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